Sunday, June 28, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 134: शायरी में ’चर्बा’- सर्क़ा--तवारूद या प्रेरणा ?

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 134: शायरी में ’चर्बा’- सर्क़ा--तवारूद या प्रेरणा ? 


मेरे एक शायर मित्र ने एक गज़ल कहीं। इत्तिफ़ाक़न और ग़ैर कस्दन[ बिना जानबूझ कर]

उनका एक मिसरा किसी नामचीन शायर के एक मशहूर मिसरे से ’टकरा’ गया।

जब उन्हे पता चला तो काफी नदामतजदा हुए। उन्होने इस वाक़िया पर मेरी राय पूछी।

यह आलेख उसी संदर्भ में है।

वैसे भी ’चर्बा’--सर्क़ा--तवारुद  और प्रेरणा में बहुत बारीक़ अन्तर होता है।

[ इस विषय पर कभी विस्तार से और अलग से चर्चा करूँगा ]

पहले भी ऐसे कई शायरों ने इत्तिफ़ाक़न या सयास ऐसी कोशिश की है उमीदन आगे भी ऐसा होता रहेगा।

उदाहरण के तौर पर

ऎ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है ,

वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता  है ।

 यह- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़-   साहब का शे’र है


मगर इसी शे’र को किसी [ नामालूम] शायर ने यूँ लिखा/सुनाया

मुद्दई लाख बुरा चाहे क्या होता है 

वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।

इसे आप क्या कहेंगे? चर्बा--सर्क़ा-तवारुद ? या प्रेरणा?

एक दूसरा उदाहरण देखिए--

दीवार-ए-चमन पर ज़ाग़-ओ-ज़गन

मसरूफ़ हैं नौहाख़्वानी में ’

हर शाख में उल्लू बैठा है

अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा ।

[ ज़ाग-ओ-ज़गन = चील कौआ]

[ नौहाख़्वानी में = रोने धोने में ]

 यह शे’र -क़माल सालारपूरी-साहब का है 

मगर इसी शे’र को-

शौक़ बहराइचवी ने इसे यूँ कहा--

र्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफी है

हर शाख़ पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा?

इसे आप क्या कहेंगे? चर्बा--सर्क़ा-तवारुद ? प्रेरणा?

एक तीसरा उदाहरण और लेते हैं--

गए दोनों ज़हान के काम से हम ,न इधर के रहे,न उधर के रहे ।

न ख़ुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनम, न इधर के रहे ,न उधर के रहे ।

यह शे’र -मिर्ज़ा सादिक़ ’शरर’- साहब का है

मगर रेख़्ता में इसे किसी ना मालूम शायर के नाम से यूँ दिया है

न ख़ुदा ही मिला ,न विसाल-ए-सनम, न इधर के हुए न उधर के हुए

रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम , न इधर के हुए न उधर के हुए।

[ मूल शे’र मे -रहे - और इस शे’र में -हुए- ]

इसे आप क्या कहेंगे? चर्बा--सर्क़ा-तवारुद ? प्रेरणा ?


ऐसी ग़लतियाँ इस लिए हो जाती है कि जब हम किसी मशहूर मिसरे पर --गिरह- लगाते है 

और वह गिरह इतना शानदार हो जाता है 

और मशहूर हो जाता है कि मूल शे’र नेपथ्य [ पस-ए-पर्दा] में चला जाता है।

और भी बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे

एक शे;र और --बशीर बद्र साहब का एक शे’र है--

उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो

न जाने ज़िंदगी के किस गली में शाम हो जाए।


{सुना है]--जब बद्र साहब से कहा गया कि जनाब इसमे एक मिसरा तो किसी और का है

 तो उनका जवाब था --तो क्या हुआ। मैने वह मिसरा उठा कर इस शे’र को कितना कीमती कर दिया।

बड़े लोग की बड़ी बात

मेरी तो यही सलाह होगी

--  हमें ऐसी स्थितियों से मुमकिना तौर पर बचना चाहिए

-- अगर किसी की मिसरा ले ही लिया है तो उसे पूरा का पूरा मुसल्लम ही उठाना चाहिए और 

अपने कलाम मे "----" दिखाना चाहिए जिसका मतलब यह होता कि यह मिसरा हमारा नहीं फ़लाना साहब का है। 

सुनाते वक़्त ता हाशिए पर उन साहब का नाम भॊ ले लें तो सोने में सुहागा।


-आनन्द पाठक ’आनन’ -

8800927181


Tuesday, June 23, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 133]: मुन्तज़िर--मुन्तज़र

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 133] : मुन्तज़िर--मुन्तज़र


मुन्तज़िर और मुन्तज़र दोनों उर्दू के लफ़्ज़ है और दोनो में ही "इन्तज़ार" का भाव छुपा हुआ है ।

मुन्तज़िर = किसी का इन्तज़ार करने वाला , प्रतीक्षा करने वाला, प्रतीक्षक

मुन्तज़र  = जिसका इन्तज़ार किया जाए ,जिसकी राह देखी जाए, जिसकी प्रतॊक्षा की जाए 

हाँ तो? इसमें कौन सी नई बात है?यह तो सब जानते है।

 बिलकुल जानते होंगे।

अल्लामा इक़बाल साहब की एक मशहूर ग़ज़ल है। आप सबने पढ़ा सुना होगा।

  कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़िर, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में

  कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मिरी जबीने-नियाज़  में । 

-इक़बाल-

यह ग़ज़ल बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। यानी

11212---11212----11212---11212 का ।

 यह ग़ज़ल इतनी मानूस है कि तमाम ग़ज़ल के  मज़्मूआ में पाया जाता है और बहुत से गायकों ने इसे गाया है।

हाँ तो?

मगर कई जगह --मिसर उला में---मुंतज़िर--छपा हुआ मिलेगा--तो कहीं -मुंतज़र--छपा मिलेगा।

और गायकों ने भी कहीं इसे - मुंतज़िर-गाया है और कहीं-- मुंतज़र- गाया है।

तो सही क्या है फिर? रेख़्ता में सही दिया गया है।

सही मिसरा है--

 कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़र, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में

यानी आप की प्रतॊक्षा है--

 तो ऐसा क्यों हो जाता है? ख़ल्त मल्त क्यों हों जाता है फिर?

दोनॊ शब्द इतने आस पास है कि खल्त मल्त का इमकान बना रहता है

दूसरी बात यह कि दोनो ही शब्दो का वज़्न एक सा ही है- 212 -

मुन्तज़िर = मुन त ज़िर = 2 1 2

मुन्तज़र = मुन त  ज़र =2 1 2

अगर आप गाएंगे तो ग़लती पकड़ में न आएगी --गाने में खटका न लगेगा--कारण कि दोनो केस मे

लय समान गति -प्रवाह में रहेगी। 

मगर भाव??

[असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है  अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाइएगा।

ताकि मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181