उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 139: वतद-ए-मौक़ूफ़ [ ---- क़िस्त 138 से आगे]
पिछली क़िस्त [चर्चा 004] में वतद [ 3-हर्फ़ी ] शब्द पर चर्चा की थी जिसमे वतद-ए-मजमुआ और वतद-ए-मौक़ूफ़
पर विशेष चर्चा की थी।
आप जानते है कि वतद-ए-मजमुआ [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन] वाले 3-हर्फ़ी शब्द का वज़न 1 2 होता है
जैसे --शजर--सहर--मरज-- अगर--्लहर --आदि
कभी आप ने सोचा है कि इन सबका वज़न 1 2 ही क्यॊ होता है - 1 1 1 - क्यों नहीं होता। आज इसी पर चर्चा करेंगे
जैसा कि पहले ही मैं बता चुका हूँ कि उर्दू ज़बान की हैय्यत [ बनावट] ही ऐसी है कि पहला हर्फ़ मुतहर्रिक और आख़िरी हर्फ़ by default या लाज़िमन साकिन ही होता है ।
वतद-ए-मजमुआ में आप देख रहे है कि [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन] में आख़िरी हर्फ़ साकिन है ही।
एक बात और -[ घड़ी भर के लिए आप कल्पना कर लें --बस कल्पना ही करें आगे और कुछ नही-हा हा हा😆😆
मुतहर्रिक हर्फ़ --नर और साकिन हर्फ़ -मादा। तो बात समझने में कुछ आसानी हो जाएगी। इत्तिफ़ाक़न यहाँ साकिन वामांगी भी है हिंदी के लिहाज़ से ]😅😅
जब एक मुतहर्रिक हर्फ़ पास वाले साकिन हर्फ़ से मिलता है तो जोड़ा बना लेता है-2- बना लेता है [एक मन-दो बदन] जिसे अरूज़ की भाषा में --सबब- [सबब-ए-ख़फ़ीफ़] कहते है।
ख़फ़ीफ़ क्यों? अरे भाई जिसके बगल में -मादा-खड़ी हो उसकी आवाज़ ख़फ़ीफ़ ही निकलेगी मेरी तरह मीऊँ मीऊँ।
तो मुतहर्रिक का क्या हुआ ? कुछ नहीं। वह अकेले ही खड़ा रहा -1- बन कर stand alone-|
वतद-ए-मजमुआ = [मुतहर्रिक+मुतहर्रिक+साकिन]= मुतहर्रिक +[ मुतहर्रिक+साकिन]
= मुतहर्रिक + सबब= 1 2
इसी लिए वतद-ए-मुजमुआ शब्द का वज़न 1 2 आता है या लिया जाता है।
अब इसी समूह के कुछ शब्द देखते है--[ ख़याल रहे आख़री हर्फ़ हमेशा साकिन रहेगा]
ख़बर = ख़+बर =1 2
अबद= अ+बद = 1 2 [ हमेशा]
हरज = ह+ रज = 1 2 [ क्या हरज है?
सफ़र = स+ फ़र = 1 2 [ ज़िंदगी का सफ़र]
ऐसे ही बहुत से अल्फ़ाज़----
ठीक यही बात वतद-ए-मौक़ूफ़ [ मुतहर्रिक+साकिन +साकिन ] के साथ है -
वतद-ए-मौक़ूफ़ [ मुतहर्रिक+साकिन +साकिन
= [ मुतहर्रिक+साकिन] + साकिन
= सबब+ साकिन= 2 1
फिर आख़िर वाले साकिन का क्या हुआ? कुछ नहीं। वह अकेले ही खड़ा रहा -1- बन कर stand alone-|
अब कुछ शब्द वतद-ए-मौक़ूफ़ के देखते हैं--ख़याल रहे आख़िरी हर्फ़ हमेशा साकिन रहेगा--और दूसरे मुक़ाम वाला हर्फ़ भी साकिन [स्वर रहित] है
अस्ल = अस+ ल = 2 1 = ओरिजनल
कब्र = कब +र = 2 1
जुर्म = जुर +म =2 1 [ अपराध]
सर्द = सर +द = 2 1 [ ठंडा]
ऐसे ही बहुत से अल्फ़ाज़
यही कारण है कि वतद-ए-मौक़ूफ़ वाले शब्द 2 1 के वज़्न पर आते हैं या लिए जाते हैं।
आप ने देखा -1- दोनो ही हर्फ़ के लिए प्रयोग हुआ --हर्फ़ चाहे मुतहर्रिक हो या साकिन। इसी लिए 1 2 12 जैसी
अलामात अफ़ाइल दिखाने के लिए बहुत मुफ़ीद या full proof व्यवस्थ नहीं मानते हैं।
ख़ैर।
अब आगे बढ़्ते है। ऐसा नहीं कि उर्दू में सिर्फ़ 2-हर्फ़ी या 3- हर्फ़ी शब्द ही होते हैं। चार हर्फ़ी शब्द भी होते है जिसे
अरूज़ की भाषा में फ़ासिला कहते हैं -विशेष रूप से फ़ासिला सुग़्रा। अगरचे इस की ज़रूरत आप को पड़ेगी नहीं मगर जानने में क्या बुराई। अर्कान का काम वतद और सबब की जानकारी से ही चल जाएगा। अब चूँकि अरूज़ियों ने परिभाषा गढ़ दी तो चर्चा कर ही लेते हैं।
फ़ासिला के दो शब्द लेते है --
हरकत और बरकत --इसी से समझने की कोशिश करते हैं यानी 3- मुतहर्रिक +1 साकिन [आख़िरी वाला]
बरकत = ब+र+क+त्= मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन
यानी आख़िर में साकिन तो आना ही था ,बाक़ी सब पर [ ब-र-क पर] जबर की हरकत लगी हुई है।
तो बरकत का वज़न क्या होगा ?
बरकत = ब+र+क+त्= मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + साकिन
= मुतहर्रिक + मुतहर्रिक + [मुतहर्रिक + साकिन ]
= मुतहर्रिक+ मुतहर्रिक + सबब [ सबब-ए-ख़फ़ीफ़]
= 1 1 2 = 112
अब 1 1 [ मुतहर्रिक+मुतहर्रिक] को क्या बोलें? अरूज़ की भाषा में यह भी सबब की हैसियत का 1 1 मिल कर दो तो हैं मगर अलग अलग खड़े है
अपने अपने सर पर हरकत का बोझ लिए खड़े है --यानी सकील है भारी है।
इसीलिए 1 1 को सबब-ए-सकील कहते है
यानी बरकत शब्द = सबब-ए-सकील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से भी बना माना जा सकता है।
जब हम अफ़ाइल [रुक्न] को सबब--ए- सकील और सबब-ए- खफ़ीफ़ से दिखा सकते है --तो फ़ासला की ज़रूरत क्या । इसके बिना भी काम चल जाएगा।
यही बात शब्द ’हरकत’ के लिए भी और ऐसे बहुत से शब्द के लिए भी।
चलते चलते--
आप इन सब अरूज़ के चक्कर में मत पड़िए --आप अपनी शायरी करते चलिए -जैसे कर रहे हैं । यह सब अरूज़ियों के चोचले हैं।
यह तो बस बात निकली तो चर्चा कर लिय॥
सादर
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181