उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 133] : मुन्तज़िर--मुन्तज़र
मुन्तज़िर और मुन्तज़र दोनों उर्दू के लफ़्ज़ है और दोनो में ही "इन्तज़ार" का भाव छुपा हुआ है ।
मुन्तज़िर = किसी का इन्तज़ार करने वाला , प्रतीक्षा करने वाला, प्रतीक्षक
मुन्तज़र = जिसका इन्तज़ार किया जाए ,जिसकी राह देखी जाए, जिसकी प्रतॊक्षा की जाए
हाँ तो? इसमें कौन सी नई बात है?यह तो सब जानते है।
बिलकुल जानते होंगे।
अल्लामा इक़बाल साहब की एक मशहूर ग़ज़ल है। आप सबने पढ़ा सुना होगा।
कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़िर, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में
कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मिरी जबीने-नियाज़ में ।
-इक़बाल-
यह ग़ज़ल बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। यानी
11212---11212----11212---11212 का ।
यह ग़ज़ल इतनी मानूस है कि तमाम ग़ज़ल के मज़्मूआ में पाया जाता है और बहुत से गायकों ने इसे गाया है।
हाँ तो?
मगर कई जगह --मिसर उला में---मुंतज़िर--छपा हुआ मिलेगा--तो कहीं -मुंतज़र--छपा मिलेगा।
और गायकों ने भी कहीं इसे - मुंतज़िर-गाया है और कहीं-- मुंतज़र- गाया है।
तो सही क्या है फिर? रेख़्ता में सही दिया गया है।
सही मिसरा है--
कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़र, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में
यानी आप की प्रतॊक्षा है--
तो ऐसा क्यों हो जाता है? ख़ल्त मल्त क्यों हों जाता है फिर?
दोनॊ शब्द इतने आस पास है कि खल्त मल्त का इमकान बना रहता है
दूसरी बात यह कि दोनो ही शब्दो का वज़्न एक सा ही है- 212 -
मुन्तज़िर = मुन त ज़िर = 2 1 2
मुन्तज़र = मुन त ज़र =2 1 2
अगर आप गाएंगे तो ग़लती पकड़ में न आएगी --गाने में खटका न लगेगा--कारण कि दोनो केस मे
लय समान गति -प्रवाह में रहेगी।
मगर भाव??
[असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाइएगा।
ताकि मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ।
-आनन्द.पाठक ’आनन’-
880092 7181