Tuesday, June 23, 2026

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 133]: मुन्तज़िर--मुन्तज़र

उर्दू बह्र पर एक बातचीत [क़िस्त 133] : मुन्तज़िर--मुन्तज़र


मुन्तज़िर और मुन्तज़र दोनों उर्दू के लफ़्ज़ है और दोनो में ही "इन्तज़ार" का भाव छुपा हुआ है ।

मुन्तज़िर = किसी का इन्तज़ार करने वाला , प्रतीक्षा करने वाला, प्रतीक्षक

मुन्तज़र  = जिसका इन्तज़ार किया जाए ,जिसकी राह देखी जाए, जिसकी प्रतॊक्षा की जाए 

हाँ तो? इसमें कौन सी नई बात है?यह तो सब जानते है।

 बिलकुल जानते होंगे।

अल्लामा इक़बाल साहब की एक मशहूर ग़ज़ल है। आप सबने पढ़ा सुना होगा।

  कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़िर, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में

  कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मिरी जबीने-नियाज़  में । 

-इक़बाल-

यह ग़ज़ल बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। यानी

11212---11212----11212---11212 का ।

 यह ग़ज़ल इतनी मानूस है कि तमाम ग़ज़ल के  मज़्मूआ में पाया जाता है और बहुत से गायकों ने इसे गाया है।

हाँ तो?

मगर कई जगह --मिसर उला में---मुंतज़िर--छपा हुआ मिलेगा--तो कहीं -मुंतज़र--छपा मिलेगा।

और गायकों ने भी कहीं इसे - मुंतज़िर-गाया है और कहीं-- मुंतज़र- गाया है।

तो सही क्या है फिर? रेख़्ता में सही दिया गया है।

सही मिसरा है--

 कभी ऐ हक़ीक़ते- मुन्तज़र, नज़र आ लिबासे-मजाज़ में

यानी आप की प्रतॊक्षा है--

 तो ऐसा क्यों हो जाता है? ख़ल्त मल्त क्यों हों जाता है फिर?

दोनॊ शब्द इतने आस पास है कि खल्त मल्त का इमकान बना रहता है

दूसरी बात यह कि दोनो ही शब्दो का वज़्न एक सा ही है- 212 -

मुन्तज़िर = मुन त ज़िर = 2 1 2

मुन्तज़र = मुन त  ज़र =2 1 2

अगर आप गाएंगे तो ग़लती पकड़ में न आएगी --गाने में खटका न लगेगा--कारण कि दोनो केस मे

लय समान गति -प्रवाह में रहेगी। 

मगर भाव??

[असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है  अगर कोई ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही ज़रूर फ़रमाइएगा।

ताकि मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ।

-आनन्द.पाठक ’आनन’-

880092 7181


उर्दू बह्र पर एक बातचीत [ किस्त 132] : बह्र 212--212--212-2122 पर एक चर्चा

 :   बह्र 212--212--212-2122 पर एक चर्चा

मेरे एक मित्र ने एक सवाल किया  था कि बह्र
212---212---212---2122 एक वैध और मान्य बह्र है या हो सकती है ?

यह आलेख उसी संदर्भ में लिखा गया है ।

 Technically and strictly  यह बह्र और यह वज़न मुमकिन तो है मगर

pragmatically  और व्यावाहारिक रूप से इस बह्र के साथ कुछ संकोच भी है।

तरफ़ैल-एक ज़िहाफ़ का नाम है जिसका इस्तेमाल 212 पर किया जा सकता है।

यह ज़िहाफ़ ख़ास तौर से शे’र के अरूज़/ज़र्ब  मुक़ाम के लिए होता है यानी शे’र के आख़िरी रुक्न के मुक़ाम के लिए। अगर इसका अमल 212 पर करें तो।

212 + तरफ़ैल = मुरफ़्फ़ल 2122 होगा और ऐसा अमल किया तो जा सकता है मनाही नही।

मगर--

-तरफ़ैल- ज़िहाफ़ वस्तुत: अरबी का ख़ास ज़िहाफ़ है, फ़ारसी में इसका इस्तेमाल बहुत कम  हुआ है और उर्दू में भी इसका रिवाज नहीं है, लगभग -न- के बराबर । अरूज़ मे इस बह्र में यह ज़िहाफ़’मतरूक’ [ छोड़ा हुआ ,त्यागा हुआ] की हैसियत रखता है। अत: यह बह्र और यह वज़न  बहुत प्रचलन में नहीं है। लोकप्रिय भी नही है।

लोग इस बह्र में शायरी करने से गुरेज़ करते है।

प्रचलन में या रिवाज़ में होना न होना अलग बात है। और अरूज़ के ऐन क़ायदे के मुताबिक वज़ूद में होना अलग बात है।

अगर आप इस वज़न/ बह्र में शायरी कर सकते है तो कर सकते है -मनाही नहीं।

" लीक छाड़ि तीनौ चलें--’शायर’-सिंह -सपूत

[ नोट- असातिज़ा से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अगर कुछ ग़लत बयानी हो गई हो तो निशानदिही फ़रमा दे जिससे 

मैं ख़ुद को दुरुस्त कर सकूँ।

सादर

आनन्द पाठक ’आनन’-

8800927181